Saturday, March 20, 2010

श्रधा

अंजली भर वीणा सी नदी का कल कल जल
उस ऋतू बसंत के झोके से ,
गिरता था मंदिर पर बूँद बूँद
अशव्मेघ विजय का मेघो से पाकर
रशिम कण नदी में यों फूटता था ,
मनो रहस्य गीता कह दिया जीवन के एक छंद में

सहस्त्र परो का सुमधुर कलरव ,
गूजता था दूर गगन में बन में ,
ओस की कलायल कंपित बूँद
मिली संगनी से यों
मानो
जीवन समस्त के धागों को जोड़ा हो प्रेम के एक छंद में

कुसुमीत बगियाँ में भोरों का गुंजन ,
बिंदिया था कुसूम की महकती दुल्हनियां का ,
संगर्ष करती थी जल की हर बूँद
पार उतरने बीच खड़े पहाड़ से यों ,
मानो जीवन के संगर्शों को पिरोया हो एक छंद में

फिर भी बिन जल मीन सा विरह
मन उष्ण ठण्ड से जलता रहा ,
एक प्रशन यह पूछता रहा ,
क्यूँ गिरता था अंजलि भर जल मंदिर के देव पर



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