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धुँ धुँ करती श्वास और ज्वालाओ सी जलन ,
जल उठा हूँ मन ,
मीत मिलन की कैसी यह तड़प ।
अंधकारों में तेरी झलक और सन्नाटो का शौर ,
तेरी खुशबू हूँ हर रग,
प्रीतम मन से मन का कैसा यह जोर ।
नाद है हर शन हुंकार और चन्द्र सी देहक ,
तेरा तन या हूँ मै,
हीरा ना मोती हो , हो बस तेरी महक ।
सम्मोहित है प्रकृति सारी, और लज्जा सा पहर,
लपट ले उठा हूँ होना ,
क्या मैं, तेरे नयन , तेरा काजल, तेरे अधर ।
तेरी भाषा मैं क्या जाणु रे !
तू गौरी, मैं श्यामल
तेरी आँखे काला बादल,
नैनों में सावन , मैं रोऊ कैसे रे !
तेरी भाषा मैं क्या जाणु रे !
तेरी चुनर कोरी धान, मैं नहीं रंग या बहार ,
तू सुन्दर रागिनी, मैं कोरा वाद ,
सुर की नदिया, तू सुन्दर गान ,
प्रीत राह संकीर्ण, मैं चलूँ कैसे रे !
तेरी भाषा मैं क्या जाणु रे !
निपट गंवार कोरा फकीर ,
वस्त्र जाने किट , शरीर कंकाल ,
चंचल तू चित पावन , नयन अलख ,
विधि बहूत महान कैसे लडू रे !
तेरी भाषा मैं क्या जाणु रे !
तू फिर कोई साज कर ,
गहन पहन वीणा से मधुर वाद कर ,
ह्रदय कोई तो धड्केगा, कर्ण कोई तडपेगा ,
वो देख मस्त नर्त्य में लीन रे !
तेरी भाषा तेरा प्रियतम, वो जल तू मीन रे !
अंजली भर वीणा सी नदी का कल कल जल
उस ऋतू बसंत के झोके से ,
गिरता था मंदिर पर बूँद बूँद ।
अशव्मेघ विजय का मेघो से पाकर
रशिम कण नदी में यों फूटता था ,
मनो रहस्य गीता कह दिया जीवन के एक छंद में ।
सहस्त्र परो का सुमधुर कलरव ,
गूजता था दूर गगन में बन में ,
ओस की कलायल कंपित बूँद
मिली संगनी से यों
मानो जीवन समस्त के धागों को जोड़ा हो प्रेम के एक छंद में ।
कुसुमीत बगियाँ में भोरों का गुंजन ,
बिंदिया था कुसूम की महकती दुल्हनियां का ,
संगर्ष करती थी जल की हर बूँद
पार उतरने बीच खड़े पहाड़ से यों ,
मानो जीवन के संगर्शों को पिरोया हो एक छंद में ।
फिर भी बिन जल मीन सा विरह
मन उष्ण ठण्ड से जलता रहा ,
एक प्रशन यह पूछता रहा ,
क्यूँ गिरता था अंजलि भर जल मंदिर के देव पर ।