मन खोजी क्षण , प्रति क्षण खोज रहा :
तारो की तरह नगन आकाश में ,
रुक रुक के आंसू जैसे बरस रहा ;
शीशे के फूल बागों में मेरे ,
सुन्दरता में अपना ही अंश देख रहा ,
पगलाई ओंस ज्यों सूरज को छु उड़ जाती ;
ऐसे ही मन खोजी क्षण, प्रति क्षण खोज रहा |
देव बेठा ज्यों मेरे मन्दिर में ,
फूलों की सुगंध या पुजारियों के वंदन में ,
कलि खड्ग ज्यों रक्त की प्यास निहार रहा,
ऐसे ही मन खोजी क्षण, प्रति क्षण खोज रहा |
बाग़ कईतरे फूलों के होए ,
इश्क की डालिया , फूल आंसुओ के बोए ,
गीले नयन ज्यों प्रीतम की बात निहार रहा ,
ऐसे ही मन खोजी क्षण, प्रति क्षण खोज रहा |
खोज की प्यास जब चरम चढ़ जाती ,
मन के खोने से पहले जब आह खो जाती ,
तब दर्द से नई आह उठती है ,
मन की खोज क्षण प्रति क्षण बदती है |
- राहुल वैष्णव
Friday, July 24, 2009
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