Saturday, November 13, 2010

जल उठा हूँ मैं


धुँ धुँ करती श्वास और ज्वालाओ सी जलन ,
जल उठा हूँ मन ,
मीत
मिलन की कैसी यह तड़प

अंधकारों में तेरी झलक और सन्नाटो का शौर ,
तेरी खुशबू हूँ हर रग,
प्रीतम मन से मन का कैसा यह जोर

नाद है हर शन हुंकार और चन्द्र सी देहक ,
तेरा तन या हूँ मै,
हीरा ना मोती हो , हो बस तेरी महक

सम्मोहित है प्रकृति सारी, और लज्जा सा पहर,
लपट ले उठा हूँ होना ,
क्या मैं, तेरे नयन , तेरा काजल, तेरे अधर