Sunday, November 15, 2009

मेरा जोग

मन जाने कैसा जोगी ,
बात ना , पथ ना , ना फैर समय का कैसा जोगी

लिए एकतारा डोलता फिरे ,
अलाप या लहरी खोजता फिरे ,
भूख लगे कभी तो दो दाने बो लेता
क्या है रैन , या सवेरा नाचता फिरे ।।

वो भी काश के जोगण हो लेती ,
काया की लाली नैनो का काजल हो लेती ,
नयन आंसू में रोते तो फिर से जन्म जाते
मैं तो जोगी न्यारा वो जोगण हो लेती ।।

काहे ये पोथी , कैसी कोरी किताब ,
मन को भावे, रूप रास ना आराम ,
जो सूरज उगे तो तख्तों पे ताज सजा लेता
आज सर्द रातों में ताप रहा अलाप ।।

कैसा मन कौन सी इच्छा ,
भुत आवे तो थर -थर काँपे मनुषा
हारने से पहले शायद नया खेल खोज लूँ ,
मर्त्यु देख नौका गढ़ रही मेरी अनुन्षा ।।

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